परिचय

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Wednesday 2 March 2011

Sunday 8 August 2010

आफिस की ये फाईलें


आफिस की ये फाईलें-

मेरे सपने में आती हॆं

कभी हंसती हॆ

कभी रोती हॆ

कभी चिडाती हॆं

कभी डराती हॆं

तो कभी धमकाती हॆं.

आफिस की ये फाईलें-

मेरे सपने में आती हॆं.

ये फाईलें-

सिर्फ कागज का पुलिंदा नहीं हॆं

हर फाईल के पीछे

छुपा हॆ एक चेहरा

जो न तो गूंगा हॆ

ऒर न ही बहरा.

यह चेहरा

कभी-कभी मेरे सामने-

आकर खडा हो जाता हॆ

अजीब-अजीब सी

शक्लें बनाता हॆ.

कभी हाथ जोडता हॆ

कभी मुस्कराता हॆ

कभी रोता हॆ

कभी गिडगिडाता हॆ

तो कभी-

मुट्ठी तानकर-

खडा हो जाता हॆ.

सच कहूं-

कभी-कभी तो

मॆं बहुत छोटा

ऒर ये चेहरा-

बहुत बडा हो जाता हॆ.

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Monday 1 March 2010

सभी बुड्ढे हुए जवान, इस होली में



क्यों सोता चद्दर तान ,इस होली में?
सभी बुड्ढे हुए जवान, इस होली में
बाहर निकल कर देख जरा तू
क्यों बॆठा हॆ,अपनी ही खोली में ?
किसने किसको कब,क्या बोला ?
मत रख अब तू ध्यान, इस होली में
खट्टा-कडवा ,अब कब तक बोलेगा?
मिश्री-सी दे तू घोल, अपनी बोली में
माना की जीवन में दु:ख ही दु:ख हॆ
अपनी गठरी दे तू खोल,इस होली में
न हिन्दू,न मुस्लिम, ,न सिख,न ईसाई
सभी बने जाते इन्सान, इस होली में.

Thursday 31 December 2009

मंहगाई ऒर नया साल

मंहगाई ऒर नया-साल


-विनोद पाराशर-

हमने कहा-

नेताजी! मंहगाई का हॆ बुरा हाल

बीस रुपये किलो आटा

अस्सी रुपये दाल

मुबारक हो नया साल.

देसी घी का दिया-

सिर्फ प्रभु के सामने जला रहे हॆं

ऒर-हम खुद!

सूखे टिक्कड चबा रहे हॆं.

बच्चों को-

दूध नहीं/चाय पिला रहे हॆं

रो-धोकर-

गृहस्थी की गाडी चला रहे हॆं.

पांच रुपये वाला सफर

अब दस में तय होता हॆ

सच कहूं!

मन-अन्दर ही अन्दर रोता हॆ.

इस नये साल में-

कुछ तो कीजिये

थोडी-बहुत राहत

हमें भी दीजिये.

वो बोले-थोडा सब्र कीजिये!

इस नये साल में-

हम एक नयी योजना बना रहे हॆं

प्राचीन संस्कृति फिर से ला रहे हॆं

हमारे पूर्वजों ने-

पूरी जिंदगी बिता दी

सिर्फ एक लंगोट में

आप घूमते हॆं

हर रोज/नये पॆंट-कोट में.

दर-असल!

कम कपडों में रहना

एक कला हॆ

इसमें/हम सभी का भला हॆ.

इस कला का प्रचार-

हर शहर/हर गांव में करवायेंगें

इस शुभ काम के लिए-

आदरणीय

’मल्लिका सेहरावत’ जी को बुलवायेंगे.

हमारे ऋषियों ने कहा हॆ-

कम खाओ, ज्यादा पीओ

लंबा जीवन जीओ.

हम भी कहते हॆं-

कम खाईये,ज्यादा पीजिये

अपनी सुविधानुसार-

बोतल,अद्धा,पव्वा या पाउच लीजिये.

कुछ लोग-

आरोप लगाते हॆं

कि-हम

सिर्फ अमीरों को ही पिलाते हॆं.

इस नये साल में-

हम-

हर शहर,हर गांव व हर गली में

यह सुविधा उपलब्ध करवा रहे हॆं

’विदेशी ब्रांड’ का अच्छा माल

समाज के हर तबके के लिए ला रहे हॆं.

जरा पीकर तो देखिये-

ऎसा मजा आयेगा!

मंहगाई,बेरोजगारी व गरीबी जॆसा-भयानक सपना

आपको कभी नहीं डरायेगा.

हम तो कहते हॆं-

खुद भी पीजिये

ऒरों को पिलाइये

सभी को प्रेम से गले लगाइये

नये साल का जश्न हॆ

जरा धूम-धाम से मनाइये.

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